सम्मानीय बंधुओं ,
्वंदेमात्र्म |
भारतीय समाज में चारों वर्णों से अलग एक वर्नातित देवजाति हैं चारण |आप जानते ही हैं की मुझे भी इस जाति में जन्म लेने का गोरव प्राप्त हुआ हैं जिस जाति ने सत्य को ही अपना हथियार बनाया और उसी सत्य के आधार पर इस जाति ने सम्राटों एवं सत्ता को खुली चुनोतियाँ भी दी |मैने भी अपनी देव जाति की परम्परा को आगे बढ़ाने का काम सं १९८५ से ही कार्य शुरू कर दीया था ,आज पचीस वर्ष हो गये हैं में राष्ट्रीय एकता ,सांप्रदायिक सद्भाव ,भाईचारे ,कोमी एकता एवं समन्वयात्मक राजनीति को बढ़ावा देने का ही काम किया आज मुझे लगने लगा हैं की यदी में किसी अन्य जाति में जन्मा होता तो मैने कब का अपना लक्ष्य बदल दीया होता परन्तु मेरे रगों में दोड्नेवाले चारण ततव ने मुझे विचलित नही होने दीया एसा नहीं हैं की मुझे भी लालच नही दिए गये परन्तु भीतर तक धन के प्रति कोई गहरी लालसा थी ही नहीं इसीलिए में आज भी उसी लगाव से देश की एकता के लिए क्रम रत हूँ |
एसा चारण तत्वहैं क्या ? जब मैने गहराई से खुद केभीतर बहनेवाले विचारों को जाना तो मुझे मेरे प्रशन का जवाब मिल गया और में इस निष्कर्ष पर पहुचा की -------------------
चारण की चेतना को न कभी ललकारा मुगलों ने ,
अंग्रेजों को बारहठ केशरी सिंह ने ललकारा था |
हम चारण हैं हमारी चेतना का ैं न हैं कोई सानी ,
आजादी के सूरज को प्रताप सिंह ने निखारा था |
हमने ठान ली जब भी सत्ता के मोड़ डाले रुख ,
चारण चले थे अकेले ही देश ने जब पुकारा था |
हममें आज भी है कुव्वत जमाने को बदलने की ,
थी न सत्ता की समज जिनम हमने सवार था |
दुरसा आढ़ा बन्किदास गाडन केसोदास थे जींदा ,
केशरी सिंह अखा लखा जी वाह क्या नजर था \
कपूतों का न यश गाया किया वीरों को अम्र हमने ,
यूँ ही जागीरी नही मिली थी झूठों को नकारा था |
सत्ता को सच कहने का था शिर्फ़ होसला चारण में ,
प्रजा की वकालात करता प्रजा चारण सहारा था |
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