मेरे अपने आत्मीय जनों ,आपके भीतर बेठेहुये परमात्मा को में प्रणाम करता हूँ |क्या आप को कभी एसा लगा की हमारे देश के पुण्य ख़त्म हो रहें हैं /\हमारे पूर्वजों ने जो कुछ भी अच्छा किया क्या हम आप उसे संभाल पा रहे हैं ?क्या आप को नही लगता हमारा समाज दिशा हिन् होता जा रहा हैं ? कहने को हमारे पास शंकराचार्य भी हैं ,संतों की तो जैसे बाढ़ ही आगयी हैं बावजूद इसके हमारा नेतिक पतन का ग्राफ निरंतर गिरता जा रहा हैं आप क्या सोचतें हैं ?यह एकाएक हो गया हैं नहीं ,यह सबधीरे धीरे हो रहा था तब आप हम श्रदा के नाम पर अन्धविश्वाश करने में लगे हुए थे ?हमरा समाज कब पतन की रह पर चल पड़ा हम समजे इससे पहले तो हम कंगाल हो गये ?
आप स्वयम जानते हैं की आज संतों की कथाये भी व्यवसाय का शुद्ध रूप धारण कर चुकी हैं फिर भी हम आप मुक्ति के लिये इन शब्दों के करोभारियों के पास जाकर अपनी मुक्ति की ,मोक्ष की उम्मीद क्रेत्न हैं क्या यह अपने आप को हम धोका नही दे रहें हैं ?में यह नही कहता के भारत के सभी कथावाचक व्यवसायी हैं परन्तु ज्यादातर आर्थ को ही तवज्जो देते हैं |वेसे भी भारत तो इन राजनेताओं की करतूतों से बहुत ही शर्मिंदा हैं उस पर संतों के सेक्स सम्बन्धी कांड सुनकर भरी आघात लगता हैं |
मेरा निवेदन हैं भारतीय साधू समाज से की वह ऐसे पाखंडी ,ढोंगी बाबाओं पर अंकुश लगायें |हमारी श्रदा के साथ खिलवाड़ करना कितना सरल हो गया हैं ,कोई भी भारतीय प्रजा को अपने चंगुल में फांश लेता हैं को देश के कल्याण के नाम पर तो कोई धर्म के नाम पर आखिर यह सब कुछ कब तक चलेगा ?
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