सम्माननीय बंधु ,
सादर वन्देमातरम |
जब भी में किसी कवी सम्मेलन में अपनी रचनाये पढ़ कर अन्यों को सुनकर घर आता हूँ तो मुझे इस बात का दुःख होता हैं कि साहित्य के नाम पर कुछ मसखरे अपनी फूहड़ता को कितनी शालीनता के साथ प्रस्तुत करके साहित्य को निर्ममता से हलाल कर देते हैं |अपने विचारों को कविता के नाम पर श्रोताओं के जहनपर थोप देतें हैं |ऐसे लोगो के लिए मैने लिखा हैं ---------------
मसखरी कविता में फर्क नही जनता ,
सठियाये समाज कि पहचान यही हैं |
फूहड़ता नोक जोंक साहित्य नही होता ,
शब्दों के दलालों कि शान यही हैं
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