1 मैं मेहनत की खाता हूँ न किसीका दिल दुखाता हूँ ,
नहीं मैं संत सन्यासी मैं देश भक्त कहाता हूँ |
नही आश्रम मेरा कोई न अनुयाइयों का झमेला हैं ,
देश की एकता चाहूँ सोयों को मैं जगाता हूँ |
2 नरक गामी हैं जिनके कर्म नमन उनको नही करता ,
मुझे जो अच्छा लगता हैं मैं उसीका साथ देता हूँ |
हो चाहे वो संत सन्यासी ,एकता जो मुल्क में चाहे
बहुत परख के मैं हाथोंमें उनके हाथ देताहूँ |
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