Wednesday, February 10, 2010

अँधेरे नफरतों के दूर करने है यहाँ मिलके
कोमी एकता का उजाला फिर से लाना हैं |

वतन पे जान देने का नया जज्बा हो फिर पैदा
महोबत हो जिसका मजहब  वटव एस्सा बनाना हैं

बनी जो दूरिय हममें  हमे मिलके मितानी हैं
देके खून भी अपना चमन अपना सजना हैं

नफरत से कहाँ कोई पंहुचा हैं मुहोबत तक
महोबत में ही जीना हैं महोबत को ही गाना हैं

जख्मो को कुरेदो गे  तो हासिल कुछ नही होगा
सियासत  जख्म देती है मजहब तो बहाना हैं

सूबों के न हो जगड़े न जुबानो पे सियासत हो
ये सारा मुल्क अपना हैं यही जज्बा जगाना हैं

दर्दे मुल्क को मैने लफ्जों में समेत हैं
वक्त रहते मेरे भाई नफरत को भुलाना हैं

वतन से कोई नही बढकर यही पैगाम हैं मेरा
पहले खुद समज के ओरो को संजना हैं

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