Monday, February 22, 2010

हुई जो गलतियाँ हमसे हम मिलकर सुधारेंगे
सियासत ने बिखेरे कांटे उसे मिलकर बुहारेंगे

कोमी एकता की जरूरत हैं अब पुरे मुल्क को
वतन की दे देके दुहाई दिल से हम पुकारेंगे

नही देखेंगे जो बुरे एक दूजे की मेरे भाई
वतन के वास्ते हम अच्छाई को निहारेंगे

कोई मजहब नही बढकर वतन के वाशिंदों सुनलो
वतन पे मरनेवालों को तहे दिल से सराहेंगे

जो करे बात नफरत की मुल्क उसको न ब्क्षेगा
मुह्हबत का जो देगा पैगाम आरती उसकी उतारेंगे

यहाँ  की रोटियां खाकर यही के गीत गायेगें
वतन पे जान देकर के वतन अपना स्वारेंगें

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