` प्यारे बंधुओं ,
सादर वन्देमातरम |
भारत ने आजादी के तुरंत बाद लोकतंत्र को अपनाया ,मेरी द्रस्थी में यह एक एसी भूल थी जिसका खामियाजा हमारी नई पीड़ी भुगत रहीं हैं |लोकतंत्र को समजने वाली पजा को तैयार किये बिना ही हमारे नेताओं ने आनन -फानन में लोकतंत्र को अपना लिय अब जब हमें वय्वश्था में खामिया नजर आने लगी तो हमे लगने लगा की अब इस व्यवश्ता में परिवर्तन होना चाहिए परन्तु अब तो पानी सर के उपर से निकलने की तयारी में हैं -------
हमारे जींदा रहने से यहाँ पे कुछ नही होगा
व्यवस्था हो जींदा एसी हमें जहमत उठानी हैं
कोई लाखों में खेले हैं कोई फाकों में जिए हैं
करप्शन हो नही एसी जमुरियत फिर से लानी हैं
हमारे नेता अधिकारी घोटालों के शहंशाह हैं
मुल्क के गद्दारों की कभी तो सामत आनी हैं
जले नफरत के कीटाणु रियाया मुल्क को चाहे
उजाला हो मुहब्बत का सम्मा एसी जलानी हैं
मुल्क के पाप धुल जाये दुष्टों का दमन करने को
भगीरथ बनके हम सबको गंगा फिर से लानी हैं
हमारे स्वार्थ हम सब प ेकहीं हावी न हो जाये
चन्द्रगुप्त हो फीर तैयार ऐसे शिक्षा लानी है
हमारे होंसलों को कोई क्या खाख तोड़ेगा
बुजुर्गों का तजुबा है नोजवानो की जवानी है
तूफ़ान उठाने की यहाँ गद्दारों ने कसम ली है
हमे मिलके मेरे भाई मुल्क की नव बचानी है
नेताओं ने उगलकर ज़हर पैदा दूरियां कर दी
जली जो बस्तियां भाई मील के फिर बसानी है
वे गए गोरे हमारे मुल्क से मगर ऊलाद बाकी है
फूट डालेंगे जो भी हम में उनकी हस्ती मीटानी है
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