प्यारे भारत प्रिय बंधुओं ,
सादर वन्देमातरम |
आज मैने अख़बार में पढ़ा स्वामी रामदेव जी आगामी लोक सभा में भारत स्वाभिमान के लोगो को चुनावों में उतारेंगें| पढ़ कर अच्छा लगा ,एक संत देश की वय्वश्था में शिष्टाचार लाने की कोशिश कर रहा हैं | भारतीय राजनीती में संतों के आगमन के उदाहरण से अब तक कोई ज्यादा परिवर्तन नजर नही आया |संत समर्पित लोगों का भी हश्र अच्छा नही देखा |भारतीय प्रजा का संतों का जो मोक्ष लक्षी रूप हैं उस छवि के आलावा किसी भी रूप में संत क्यों न आजाये उसे नकार दीया जाता हैं |
आज भारत के कण कण जहाँ भर्ष्टाचार दीमक की तरह फेल चूका हैं वहाँ भारत की राजनीती में परिवर्तन लाना ,ईमानदारी से चुनाव लड़ना ,भारतीय चुनावी आचार सहिंता का अक्षरस पालन करते हुए बिना नोट बांटें ,बिना शराब बांटें ,केसे कोई चुनाव जित सकेगा ? नेतिकता की बातें करना अति आसन हैं परन्तु नेतिकता को जीना बड़ा ही मुश्किल काम होता हैं \भारत ने नीतियाँ बुरी हैं यह कहनेवाले आधे भारतीय हैं परन्तु हल देनेवाले कम हैं |भारतीय मतदाता बहुत ही समजदार हैं अब उसे अपना लाभ देखना आया गया हैं |उसे न तो भाषण लुभा सकतें हैं ना ही संस्कारित बातें |
Saturday, February 27, 2010
` प्यारे बंधुओं ,
सादर वन्देमातरम |
भारत ने आजादी के तुरंत बाद लोकतंत्र को अपनाया ,मेरी द्रस्थी में यह एक एसी भूल थी जिसका खामियाजा हमारी नई पीड़ी भुगत रहीं हैं |लोकतंत्र को समजने वाली पजा को तैयार किये बिना ही हमारे नेताओं ने आनन -फानन में लोकतंत्र को अपना लिय अब जब हमें वय्वश्था में खामिया नजर आने लगी तो हमे लगने लगा की अब इस व्यवश्ता में परिवर्तन होना चाहिए परन्तु अब तो पानी सर के उपर से निकलने की तयारी में हैं -------
हमारे जींदा रहने से यहाँ पे कुछ नही होगा
व्यवस्था हो जींदा एसी हमें जहमत उठानी हैं
कोई लाखों में खेले हैं कोई फाकों में जिए हैं
करप्शन हो नही एसी जमुरियत फिर से लानी हैं
हमारे नेता अधिकारी घोटालों के शहंशाह हैं
मुल्क के गद्दारों की कभी तो सामत आनी हैं
जले नफरत के कीटाणु रियाया मुल्क को चाहे
उजाला हो मुहब्बत का सम्मा एसी जलानी हैं
मुल्क के पाप धुल जाये दुष्टों का दमन करने को
भगीरथ बनके हम सबको गंगा फिर से लानी हैं
हमारे स्वार्थ हम सब प ेकहीं हावी न हो जाये
चन्द्रगुप्त हो फीर तैयार ऐसे शिक्षा लानी है
हमारे होंसलों को कोई क्या खाख तोड़ेगा
बुजुर्गों का तजुबा है नोजवानो की जवानी है
तूफ़ान उठाने की यहाँ गद्दारों ने कसम ली है
हमे मिलके मेरे भाई मुल्क की नव बचानी है
नेताओं ने उगलकर ज़हर पैदा दूरियां कर दी
जली जो बस्तियां भाई मील के फिर बसानी है
वे गए गोरे हमारे मुल्क से मगर ऊलाद बाकी है
फूट डालेंगे जो भी हम में उनकी हस्ती मीटानी है
सादर वन्देमातरम |
भारत ने आजादी के तुरंत बाद लोकतंत्र को अपनाया ,मेरी द्रस्थी में यह एक एसी भूल थी जिसका खामियाजा हमारी नई पीड़ी भुगत रहीं हैं |लोकतंत्र को समजने वाली पजा को तैयार किये बिना ही हमारे नेताओं ने आनन -फानन में लोकतंत्र को अपना लिय अब जब हमें वय्वश्था में खामिया नजर आने लगी तो हमे लगने लगा की अब इस व्यवश्ता में परिवर्तन होना चाहिए परन्तु अब तो पानी सर के उपर से निकलने की तयारी में हैं -------
हमारे जींदा रहने से यहाँ पे कुछ नही होगा
व्यवस्था हो जींदा एसी हमें जहमत उठानी हैं
कोई लाखों में खेले हैं कोई फाकों में जिए हैं
करप्शन हो नही एसी जमुरियत फिर से लानी हैं
हमारे नेता अधिकारी घोटालों के शहंशाह हैं
मुल्क के गद्दारों की कभी तो सामत आनी हैं
जले नफरत के कीटाणु रियाया मुल्क को चाहे
उजाला हो मुहब्बत का सम्मा एसी जलानी हैं
मुल्क के पाप धुल जाये दुष्टों का दमन करने को
भगीरथ बनके हम सबको गंगा फिर से लानी हैं
हमारे स्वार्थ हम सब प ेकहीं हावी न हो जाये
चन्द्रगुप्त हो फीर तैयार ऐसे शिक्षा लानी है
हमारे होंसलों को कोई क्या खाख तोड़ेगा
बुजुर्गों का तजुबा है नोजवानो की जवानी है
तूफ़ान उठाने की यहाँ गद्दारों ने कसम ली है
हमे मिलके मेरे भाई मुल्क की नव बचानी है
नेताओं ने उगलकर ज़हर पैदा दूरियां कर दी
जली जो बस्तियां भाई मील के फिर बसानी है
वे गए गोरे हमारे मुल्क से मगर ऊलाद बाकी है
फूट डालेंगे जो भी हम में उनकी हस्ती मीटानी है
Thursday, February 25, 2010
सम्मानीय जागरूक भारतीय बंधुओं ,
सादर वन्देमातरम |
भारतीय नेताओं ने मिलकर आज हमारे संसद में महगाई पर जोरदार बहस की |साधुवाद |
चलो अपने गोर्ख धन्दों ं से फुर्सत मिली तो महंगाई के मुद्दे पर देश के महान नेताओं ने अपनी महान चूपी तो तोड़ी |विपक्ष की नेता ने अच्छा भाषण दीया |मनमोहन जी को सलाह भी डी ,सोनिया जी को आगाह भी किया परन्तु इन नेताओं के चरों पर खिन भी मंहगाई की मार दिखाई नही डी ,कोई दर्द दिखाई नहीं दीया एसा लगा जेसे नेता अपनी भड़ास निकल रहें हैं | गरीब के पेट पर क्या गुजर रहीं हैं किसीको दिखाई नहीं देता |
कल संसद में भूख मिटने पे बहस हुई
सुबह एक गरीब ने दम तोडा महगाई के आगे
दुःख भरा जय हिंद
सादर वन्देमातरम |
भारतीय नेताओं ने मिलकर आज हमारे संसद में महगाई पर जोरदार बहस की |साधुवाद |
चलो अपने गोर्ख धन्दों ं से फुर्सत मिली तो महंगाई के मुद्दे पर देश के महान नेताओं ने अपनी महान चूपी तो तोड़ी |विपक्ष की नेता ने अच्छा भाषण दीया |मनमोहन जी को सलाह भी डी ,सोनिया जी को आगाह भी किया परन्तु इन नेताओं के चरों पर खिन भी मंहगाई की मार दिखाई नही डी ,कोई दर्द दिखाई नहीं दीया एसा लगा जेसे नेता अपनी भड़ास निकल रहें हैं | गरीब के पेट पर क्या गुजर रहीं हैं किसीको दिखाई नहीं देता |
कल संसद में भूख मिटने पे बहस हुई
सुबह एक गरीब ने दम तोडा महगाई के आगे
दुःख भरा जय हिंद
Wednesday, February 24, 2010
सम्माननीय भारत प्रेमी बंधुओं ,
सादर वन्देमातरम |
भारतीय मानस पटल पर आजादी के पूर्व में जो भी निर्मम घटनाएँ हमारे देश के बंटवारे को लेकर घटी वे आज भी हमारे देश की आज की प्रजा को भी चेन से नही रहने देती | मेरा विचार है की जिस देश की नै पीढ़ी अपने हिंसक अतीत कोयाद रखती हैं वः वर्तमान में तरक्की के सुनहरे दिन नही देख पति इसलिए हर भारतीय को अपने देश को ही सर्वोपरी माननाचाहिए |आज यदि भारत की नै नस्ल तरक्की क्र रही हैं तो उसका सारा का सारा शरेय भारतीय समाज की विचारधारा को जाता हैं |हमारे देश के नोजवान नै उड़ने भर रहे हैं वहीं पकिश्थान की नै नस्ल हथियारों को ही अपना भविष्य मानने लगी हैं |
कोम की गद्दारी किसी भी मुल्क को तोड़ देती हैं
नफरत मुल्क के ख्वाबों का खून निचोड़ देती हैं
सादर वन्देमातरम |
भारतीय मानस पटल पर आजादी के पूर्व में जो भी निर्मम घटनाएँ हमारे देश के बंटवारे को लेकर घटी वे आज भी हमारे देश की आज की प्रजा को भी चेन से नही रहने देती | मेरा विचार है की जिस देश की नै पीढ़ी अपने हिंसक अतीत कोयाद रखती हैं वः वर्तमान में तरक्की के सुनहरे दिन नही देख पति इसलिए हर भारतीय को अपने देश को ही सर्वोपरी माननाचाहिए |आज यदि भारत की नै नस्ल तरक्की क्र रही हैं तो उसका सारा का सारा शरेय भारतीय समाज की विचारधारा को जाता हैं |हमारे देश के नोजवान नै उड़ने भर रहे हैं वहीं पकिश्थान की नै नस्ल हथियारों को ही अपना भविष्य मानने लगी हैं |
कोम की गद्दारी किसी भी मुल्क को तोड़ देती हैं
नफरत मुल्क के ख्वाबों का खून निचोड़ देती हैं
Tuesday, February 23, 2010
mahngai pr bhs
प्यारे भारत्वशियों ,
वन्देमातरम |
आज हमारे देश में महगाइ पर दोनों सदनों में गर्म बहस हुई |दोनों सदन स्तगित किये गये |महामहिम ने महंगाई पर जो बयान दीया उस्सेल्गता हैं किसान खुश हुयेहोंगें परन्तु सारा देश महंगाई की मार से त्राहि मामकर उठा हैं | बहस से कुछ भी हासिल नही हुआ |ऐसे महंगाई को अंकुश में लायाजयेगा? मेरी समज में न्हीआता की आखिर कोई जिम्मेवारी क्यों नही लेता की कुछ लाप्र्व्हियों से ,कुछ लोगों को फायदा पहुँचने के लिए आम आदमी पर कहर वर्शा हैं |
भारत के किशानो लाभ हुआ और जिनको नुकशान हुआ वे भारत के नागरिक नहीं हैं |उनकी किसीको कोई प्रवाह नही | धन्य हैं हमारी महान सरकार को जो एक को लाभ पहुचने के लिए आम नागरिक की कमर तोड़ कर भी श्रम म्ह्सुश नहीं करती ,शेखी ब्गारती हैं |
वन्देमातरम |
आज हमारे देश में महगाइ पर दोनों सदनों में गर्म बहस हुई |दोनों सदन स्तगित किये गये |महामहिम ने महंगाई पर जो बयान दीया उस्सेल्गता हैं किसान खुश हुयेहोंगें परन्तु सारा देश महंगाई की मार से त्राहि मामकर उठा हैं | बहस से कुछ भी हासिल नही हुआ |ऐसे महंगाई को अंकुश में लायाजयेगा? मेरी समज में न्हीआता की आखिर कोई जिम्मेवारी क्यों नही लेता की कुछ लाप्र्व्हियों से ,कुछ लोगों को फायदा पहुँचने के लिए आम आदमी पर कहर वर्शा हैं |
भारत के किशानो लाभ हुआ और जिनको नुकशान हुआ वे भारत के नागरिक नहीं हैं |उनकी किसीको कोई प्रवाह नही | धन्य हैं हमारी महान सरकार को जो एक को लाभ पहुचने के लिए आम नागरिक की कमर तोड़ कर भी श्रम म्ह्सुश नहीं करती ,शेखी ब्गारती हैं |
Monday, February 22, 2010
हुई जो गलतियाँ हमसे हम मिलकर सुधारेंगे
सियासत ने बिखेरे कांटे उसे मिलकर बुहारेंगे
कोमी एकता की जरूरत हैं अब पुरे मुल्क को
वतन की दे देके दुहाई दिल से हम पुकारेंगे
नही देखेंगे जो बुरे एक दूजे की मेरे भाई
वतन के वास्ते हम अच्छाई को निहारेंगे
कोई मजहब नही बढकर वतन के वाशिंदों सुनलो
वतन पे मरनेवालों को तहे दिल से सराहेंगे
जो करे बात नफरत की मुल्क उसको न ब्क्षेगा
मुह्हबत का जो देगा पैगाम आरती उसकी उतारेंगे
यहाँ की रोटियां खाकर यही के गीत गायेगें
वतन पे जान देकर के वतन अपना स्वारेंगें
सियासत ने बिखेरे कांटे उसे मिलकर बुहारेंगे
कोमी एकता की जरूरत हैं अब पुरे मुल्क को
वतन की दे देके दुहाई दिल से हम पुकारेंगे
नही देखेंगे जो बुरे एक दूजे की मेरे भाई
वतन के वास्ते हम अच्छाई को निहारेंगे
कोई मजहब नही बढकर वतन के वाशिंदों सुनलो
वतन पे मरनेवालों को तहे दिल से सराहेंगे
जो करे बात नफरत की मुल्क उसको न ब्क्षेगा
मुह्हबत का जो देगा पैगाम आरती उसकी उतारेंगे
यहाँ की रोटियां खाकर यही के गीत गायेगें
वतन पे जान देकर के वतन अपना स्वारेंगें
Saturday, February 20, 2010
जिन्दगी को मैने कई रंगों में देखा है ---उसीको मैने अपने लफ्जों में समेटा हैं ---
गजल
वेसे जिनगी में दिल मैं हर सक्ष का दर्जा हैं
जो हमको अच्छा लगता हैं उसीकी याद आती हैं
मोतऔर जिन्दगी की जंग में आदम परेशान हैं
कोई जब अपना जाता हैं रूह आंसू बहाती हैं|
i
दोस्ती रंग बदलती हैं दुश्मनी तब समज आती
दुश्मनी हो जाये जिससे दोस्ती याद आती हैं
गेरों के जख्मों की फेहरिश्त हैं यहाँ लम्बी
जख्म जब अपना देता है जिन्दगी तब सताती हैं
भाई तो भाई हैंमेरे घर आता जाता हैं
मेरा घर जन्नत होता हैं बहन जब घर आती हैं
आखिरे वक्त में बर्षों का bichada जब mil जाये
jindhgi rudan krti हैं मोत तब muskurati हैं
गजल
वेसे जिनगी में दिल मैं हर सक्ष का दर्जा हैं
जो हमको अच्छा लगता हैं उसीकी याद आती हैं
मोतऔर जिन्दगी की जंग में आदम परेशान हैं
कोई जब अपना जाता हैं रूह आंसू बहाती हैं|
i
दोस्ती रंग बदलती हैं दुश्मनी तब समज आती
दुश्मनी हो जाये जिससे दोस्ती याद आती हैं
गेरों के जख्मों की फेहरिश्त हैं यहाँ लम्बी
जख्म जब अपना देता है जिन्दगी तब सताती हैं
भाई तो भाई हैंमेरे घर आता जाता हैं
मेरा घर जन्नत होता हैं बहन जब घर आती हैं
आखिरे वक्त में बर्षों का bichada जब mil जाये
jindhgi rudan krti हैं मोत तब muskurati हैं
Thursday, February 18, 2010
भारत देश की वेदना को मैने अपनी गजल में ढाला हैं ------------------
गजल
अभी जींदा है मेरा मुल्क इसे ललकार ना दुशमन
यहाँ झूलो में माताये देश भक्ति सिखाती हैं
हिंद के ढूध की ताकत को ना अजमाना तू
यहाँ बेवा शहीदों की खुद अर्थी उठाती हैं
खेल ही खेल में सबक हमने सिखाया था
अभी भी खोफ से माताएं बच्चो को सुलाती हैं
नादानी सरहदों की तुजे बर्बाद न करदें
हमारे शेरों को दिल्ही हर रोज मनाती हैं
तेरी इन हरकतों से,पाक लगने लगा हैं अब
गाँव की और आताहै सियार की म़ोत बुलाती हैं
गजल
अभी जींदा है मेरा मुल्क इसे ललकार ना दुशमन
यहाँ झूलो में माताये देश भक्ति सिखाती हैं
हिंद के ढूध की ताकत को ना अजमाना तू
यहाँ बेवा शहीदों की खुद अर्थी उठाती हैं
खेल ही खेल में सबक हमने सिखाया था
अभी भी खोफ से माताएं बच्चो को सुलाती हैं
नादानी सरहदों की तुजे बर्बाद न करदें
हमारे शेरों को दिल्ही हर रोज मनाती हैं
तेरी इन हरकतों से,पाक लगने लगा हैं अब
गाँव की और आताहै सियार की म़ोत बुलाती हैं
Wednesday, February 10, 2010
अँधेरे नफरतों के दूर करने है यहाँ मिलके
कोमी एकता का उजाला फिर से लाना हैं |
वतन पे जान देने का नया जज्बा हो फिर पैदा
महोबत हो जिसका मजहब वटव एस्सा बनाना हैं
बनी जो दूरिय हममें हमे मिलके मितानी हैं
देके खून भी अपना चमन अपना सजना हैं
नफरत से कहाँ कोई पंहुचा हैं मुहोबत तक
महोबत में ही जीना हैं महोबत को ही गाना हैं
जख्मो को कुरेदो गे तो हासिल कुछ नही होगा
सियासत जख्म देती है मजहब तो बहाना हैं
सूबों के न हो जगड़े न जुबानो पे सियासत हो
ये सारा मुल्क अपना हैं यही जज्बा जगाना हैं
दर्दे मुल्क को मैने लफ्जों में समेत हैं
वक्त रहते मेरे भाई नफरत को भुलाना हैं
वतन से कोई नही बढकर यही पैगाम हैं मेरा
पहले खुद समज के ओरो को संजना हैं
कोमी एकता का उजाला फिर से लाना हैं |
वतन पे जान देने का नया जज्बा हो फिर पैदा
महोबत हो जिसका मजहब वटव एस्सा बनाना हैं
बनी जो दूरिय हममें हमे मिलके मितानी हैं
देके खून भी अपना चमन अपना सजना हैं
नफरत से कहाँ कोई पंहुचा हैं मुहोबत तक
महोबत में ही जीना हैं महोबत को ही गाना हैं
जख्मो को कुरेदो गे तो हासिल कुछ नही होगा
सियासत जख्म देती है मजहब तो बहाना हैं
सूबों के न हो जगड़े न जुबानो पे सियासत हो
ये सारा मुल्क अपना हैं यही जज्बा जगाना हैं
दर्दे मुल्क को मैने लफ्जों में समेत हैं
वक्त रहते मेरे भाई नफरत को भुलाना हैं
वतन से कोई नही बढकर यही पैगाम हैं मेरा
पहले खुद समज के ओरो को संजना हैं
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